
दुर्गंधं मलभाजनं कुविधिना निष्पादितं धातुभि-
रंगं तस्य जनैर्निजार्थमखिलैराख्या धृता स्वेच्छया ।
तस्याः किं मम वर्णनेन सतत किं निंदनेनैव च
चिद्रूपस्य शरीरकर्मजनिताऽन्यस्याप्यहो तत्त्वतः ॥8॥
दुर्गन्ध मलभाजन कुकर्मों से बना सब धातु से ।
तन जग स्वयं के स्वार्थ वश, इच्छानुसार सभी कहें ॥
उसकी सदा निन्दा प्रशंसा से मुझे है लाभ क्या?
चिद्रूप मैं तन कर्म तद् भावों से भिन्न सदा रहा ॥९.८॥
अन्वयार्थ : यह शरीर दुर्गन्धमय है! विष्टा, मूत्र आदि मलों का घर है। निंदित कर्म की कृपा से मल, मज्जा आदि धातुओं से बना हुआ है । तथापि मूढ़ मनुष्यों ने अपने स्वार्थ की पुष्टि के लिये इच्छानुसार इसकी प्रसंसा की है; परन्तु मुझे इस शरीर की प्रशंसा और निंदा से क्या प्रयोजन है ? क्योंकि मैं निश्चयनय से शरीर, कर्म और उनसे उत्पन्न हुये विकारों से रहित शुद्धचिद्रूप स्वरूप हूँ ।