
कीर्तिं वा पररंजनं खविषयं केचिन्निजं जीवितं
संतानं च परिग्रहं भयमपि ज्ञानं तथा दर्शनं ।
अन्यस्याखिलवस्तुनो रुगयुतिं तद्धेतुमुद्दिश्य च
कर्युः कर्म विमोहिनो हि सुधियश्चिद्रूपलब्ध्यै परं ॥9॥
मोही करें यश अन्य रंजन, विषय इन्द्रिय प्राप्ति को ।
जीवन परिग्रह सुतादि, भय ज्ञान दर्शन अर्थ को ॥
बहु कीर्ति आदि कारणों को मिलाने रोगादि को ।
नित नष्ट करने आदि बहुविध प्रयोजन से कर्म को ॥
करते परन्तु सुधी सब परमार्थ हेतु सत् करम ।
चिद्रूप निज की प्राप्ति हेतु, बस यही नहिं अन्य करम ॥९.९॥
अन्वयार्थ : संसार में बहुत से मोही पुरुष कीर्ति के लिये काम करते हैं, अनेक दूसरों को प्रसन्न करने के लिये, इन्द्रियों के विषयों की प्राप्ति के लिये, अपने जीवन की रक्षा के लिये, संतान, परिग्रह, भय, ज्ञान, दर्शन तथा अन्य पदार्थों की प्राप्ति और रोग के अभाव के लिये काम करते हैं और बहुत से कीर्ति आदि के कारणों के मिलाने के लिये उपाय सोचते हैं परन्तु जो मनुष्य बुद्धिमान हैं, अपनी आत्मा को सुखी बनाना चाहते हैं, वे शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति के लिये ही कार्य करते हैं ।