+ ज्ञानी और अज्ञानी की विचार-धारा -
कल्पेशनागेशनरेशसंभवं चित्ते सुखं मे सततं तृणायते ।
कुस्त्रीरमास्थानकदेहदेहजात् सदेतिचित्रं मनुतेऽल्पधीः सुखं ॥10॥
सुर नाग नरपति सुख सदा, तृण जीर्णवत् लगते मुझे ।
कुस्त्री रमा घर तन सुतादि से प्रगट अज्ञ सुख कहें ॥९.१०॥
अन्वयार्थ : मैंने शुद्धचिद्रूप के स्वरूप को भले प्रकार जान लिया है, इसलिये मेरे चित्त में देवेन्द्र, नागेद्र और नरेंद्रों के सुख जीर्ण तृण सरीखे जान पड़ते हैं; परन्तु जो मनुष्य अल्पज्ञानी हैं अपने और पर के स्वरूप का भले प्रकार ज्ञान नहीं रखते वे निंदित स्त्रियां, लक्ष्मी, घर, शरीर और पुत्र से उत्पन्न हुये सुख को जो कि दुःख-स्वरूप हैं, सुख मानते हैं यह बड़ा आश्चर्य है ।