+ बद्ध-अबद्ध की अपेक्षा -
न बद्धः परमार्थेन बद्धो मोहवशाद् गृही ।
शुकवद् भीमपाशेनाथवा मर्कटमुष्टिवत् ॥11॥
ज्यों जाल भयप्रद शुक बँधा, मुट्ठी से मर्कट त्यों बँधा ।
निज मोह वश घर धनी, किन्तु वास्तव में नहिं बँधा ॥९.११॥
अन्वयार्थ : शुक को भय करानेवाले पाश के समान अथवा बंदर की मुठ्ठि के समान यद्यपि यह जीव वास्तविक दृष्टि से कर्मों से संबद्ध नहीं है तथापि मोह से बँधा ही हुआ है ।