
श्रद्धानां पुस्तकानां जिनभवनमठांतेनिवास्यादिकानां
कीर्त्तेरक्षार्थकानां भुवि झटिति जनो रक्षणे व्यग्रचितः ।
यस्तस्य क्वात्मचिंता क्व च विशदमतिः शुद्धचिद्रूपकाप्तिः
क्व स्यात्सौख्यं निजोत्थं क्व च मनसि विचिंत्येति कुर्वंतु यत्नं ॥12॥
श्रद्धान पुस्तक जिनभवन, मठ शिष्य यश इत्यादि के ।
रक्षार्थ व्यग्रनी सतत, नर आत्म चिन्तन कब करे ॥
नहिं मती निर्मल शुद्ध चिद्रूप, प्राप्ति कब आत्मोत्थ सुख ।
कैसे मिले? मन सोच! आतम लब्धि-हेतु यत्न कर ॥९.१२॥
अन्वयार्थ : यह संसारी जीव, नाना प्रकार के धर्मकार्य, पुस्तकें, जिनेंद्र भगवान के मंदिर, मठ, छत्र और कीर्ति की रक्षा करने के लिये सदा व्यग्रचित्त रहता है - उन कार्यों से रंचमात्र भी इसे अवकाश नहीं मिलता, इसलिये न यह किसी प्रकार का आत्मध्यान कर सकता, न इसकी बुद्धि निर्मल रह सकती और न शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति और - निराकुलतारूप सुख ही मिल सकता है, अतः बुद्धिमानों को चाहिये कि वे इन सब बातों पर भले प्रकार विचार कर आत्मा के चिंतवन आदि कार्य में अच्छी तरह यत्न करे ।