+ आत्माराधक पुरुष को मन में धारण करें -
अहं भ्रांतः पूर्वं तदनु च जगत् मोहवशतः
परद्रव्ये चिंतासततकरणादाभवमहो ।
परद्रव्यं मुक्त्वा विहरति चिदानंदनिलये
निजद्रव्ये यो वै तमिह पुरुषं चेतसि दधे ॥13॥
हो मोह-वश पर-द्रव्य चिन्ता से अभी तक जगत में ।
भटका सतत अब अन्य भटकें, मोह-वश ही अज्ञ ये ॥
पर-द्रव्य तज विहरें चिदानन्द मयी अपने द्रव्य में ।
उन आत्म-ध्यानी विज्ञ को, अब चित्त में धारण करें ॥९.१३॥
अन्वयार्थ : मोह के फंद में पड़कर पर द्रव्यों की चिन्ता और उन्हें अपनाने से प्रथम तो मैंने संसार में परिभ्रमण किया और फिर मेरे पश्चात्‌ यह समस्त जनसमूह घूमा, इसलिये जो महापुरुष परद्रव्यों से ममता छोड़कर चिदानंदस्वरूप निज द्रव्य में विहार करनेवाला है - निज-द्रव्य का ही मनन, स्मरण, ध्यान करनेवाला है, उस महात्मा को मैं अपने चित्त में धारण करता हूँ ।