+ आत्म-चिन्तन और मोह का फल -
स्वाधीनं च सुखं ज्ञानं परं स्यादात्मचिंतनात् ।
तन्मुक्त्वाः प्राप्तुमिच्छंति मोहतस्तद्विलक्षणं ॥15॥
निज आत्म चिन्तन से परम सुख ज्ञान आत्माधीन हो ।
यह मोह से तज करे उल्टे यत्न सुख हेतु अहो ॥९.१५॥
अन्वयार्थ : इस आत्मा के चिंतवन से - शुद्ध-चिद्रूप के ध्यान से निराकुलुतारूप सुख और उत्तम ज्ञान की प्राप्ति होती है; परन्तु मूढ़ जीव मोह के वश होकर आत्मा का चिंतवन करना छोड़ देते हैं और उससे विपरीत कार्य 'जो कि अनंत क्लेश देनेवाला है' करते हैं ।