+ शुद्ध-चिद्रूप में निश्चलता की अयोग्यता क्यों? -
यावन्मोहो बली पुंसि दीर्घसंसारतापि च ।
न तावत् शुद्धचिद्रूपे रुचिरत्यंतनिश्चला ॥16॥
जब तक बली है मोह, भव की दीर्घता इस जीव में ।
तब तक रुचि अत्यन्त निश्चल, नहीं शुद्ध चिद्रूप में ॥९.१६॥
अन्वयार्थ : जब तक आत्मा में महा-बलवान मोह है और दीर्घसंसारता - चिरकाल तक संसारमें भ्रमण करना बाकी है, तब तक इसको कभी भी शुद्धचिद्रूप में निश्चलरूप से प्रेम नहीं हो सकता ।