
अंधे नृत्यं तपोऽज्ञे गदविधिरतुला स्वायुषो वाऽवसाने
गीतं बाधिर्ययुक्ते वपनमिह यथाऽप्यूषरे वार्यतृष्णे ।
स्निग्धे चित्राण्यभव्ये रुचिविधिरनघः कुंकुमं नीलवस्त्रे
नात्मप्रीतौ तदाख्या भवति किल वृथा निः प्रतीतौ सुमंत्रः ॥17॥
ज्यों अन्ध हेतु नृत्य, तप अज्ञानि आयु अन्त में ।
औषधि गाना बधिर हेतु, बीज ऊसर भूमि में ॥
ज्यों प्यास बिन जल, चित्र चिकने पर अभव्य धरम रुचि ।
निर्दाेष विधि पट कृष्ण वर्णी पर केशरिया वर्ण भी ॥
नित अश्रद्धालु को सु न्त्र आदि ये सब व्यर्थ हैं ।
त्यों आत्म-प्रीति विना आतम कथा आदि व्यर्थ हैं ॥९.१७॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार अंधे के लिये नाच, अज्ञानी के लिये तप, आयु के अंत में औषधि का प्रयोग, बहिरे के लिये गीतों का गाना, ऊसर भृमि में अन्नका बोना, बिना प्यासे मनुष्य के लिये जल, चिकनी वस्तु पर चित्र का खींचना, अभव्य को धर्म की रुचि का होना, काले कपड़े पर केसरिया रंग और प्रतीति रहित पुरुष के लिये मंत्र प्रयोग, कार्यकारी नहीं; उसी प्रकार जिसको आत्मा में प्रेम नहीं उस मनुष्य को आत्मा के ध्यान करने का उपदेश भी कार्यकारी नहीं - सब व्यर्थ है ।