+ जीव के वास्तविक शत्रु -
मोह एव परं वैरी नान्यः कोऽपि विचारणात् ।
ततः स एव जेतव्यो बलवान् धीमताऽऽदरात् ॥19॥
नित सोच तो हो ज्ञात बैरी मोह ही नहिं अन्य है ।
यों सुधी को सब यत्न से, यह बली जय के योग्य है ॥९.१९॥
अन्वयार्थ : विचार करने से मालूम हुआ है कि यह मोह ही जीवों का अहित करने वाला महा-बलवान बैरी है । इसी के आधीन हो जीव नाना प्रकार के क्लेश भोगते रहते हैं, इसलिये जो मनुष्य विद्वान हैं -- आत्मा के स्वरूप के जानकार हैं, उन्हें चाहिये कि वे सबसे पहिले इस मोह को जीतें ।