
भवकूपे महामोहपंकेऽनादिगतं जगत् ।
शुद्धचिद्रूपसद्धयानरज्जवा सर्वं समुद्धरे ॥20॥
यह जग अनादि से, महा मोह पंकमय भवकूप में ।
डूबा अत: बाहर निकालूँ शुद्ध चित् ध्यान रज्जु से ॥९.२०॥
अन्वयार्थ : यह समस्त जगत अनादिकाल से संसार रूपी विशाल कूप के अंदर महामोहरूपी कीचड में फंसा हुआ है, इसलिये अब मैं शुद्धचिद्रूप के ध्यान रूपी मजबूत रस्सी के द्वारा इसका उद्धार करूंगा ।