+ जीव का शत्रु मोह कहने में हेतु -
शुद्धचिद्रूपसद्धयानादन्यत्कार्यं हि मोहजं ।
तस्माद् बंधस्ततो दुःखं मोह एव ततो रिपुः ॥21॥
सत् शुद्ध चिद्रूप ध्यान से, अतिरिक्त मोहज कार्य हैं ।
उनसे बँधें बहु दु:ख भोगें, यों महा रिपु मोह है ॥९.२१॥
अन्वयार्थ : संसार में सिवाय शुद्धचिद्रूप के ध्यान के, जितने कार्य हैं सब मोहज (मोह जन्य) हैं । सबकी उत्पत्ति में प्रधान कारण मोह है तथा मोह से कर्मों का बंध और उससे अनंते क्लेश भोगने पड़ते हैं, इसलिये सबसे अधिक जीवों का बैरी मोह ही है ।