+ आत्म-ध्यान करने की प्रेरणा -
मोहं तज्जातकार्याणि संगं हित्वा च निर्मलं ।
शुद्धचिद्रूपसद्धयानं कुरु त्यक्त्वान्यसंगतिं ॥22॥
सब अन्य संगति मोह मोहज कार्य तज शुद्ध मल रहित ।
चिद्रूप का सद्ध्यान कर, यदि चाह शिव-सुख तन-रहित ॥९.२२॥
अन्वयार्थ : अतः जो मनुष्य शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति के अभिलाषी हैं उन्हें चाहिये कि वे मोह और उससे उत्पन्न हुये समस्त कार्यों का सर्वथा त्याग कर दें - उनकी ओर झांककर
भी न देखें और समस्त परद्रव्यों से ममता छोड़ केवल शुद्ध-चिद्रूप का ही मनन, ध्यान और स्मरण करें ।