+ आत्मा को नहीं देख पाने का कारण -
निरंतरमहंकारं मूढाः कुर्वंति तेन ते ।
स्वकीयं शुद्धचिद्रूपं विलोकंते न निर्मलं ॥1॥
नित अहंकाराधीन रहते, अज्ञ इससे कभी वे ।
आत्मीय शुद्ध चिद्रूप निर्मल, सत्त्व को नहिं देखते ॥१०.१॥
अन्वयार्थ : मूढ़ पुरुष निरंतर अहंकार के वश रहते हैं - अपने से बढ़कर किसी को भी नहीं समझते, इसलिये अतिशय निर्मल अपने शुद्धचिद्रूप की ओर वे जरा भी नहीं देख पाते ।