अविद्वानप्यहं विद्वान् निर्धनो धनवानहं ।
इत्यादि चिंतनं पुंसामहंकारो निरुच्यते ॥3॥
विद्वान मूरख धनी निर्धन आदि बहुविध रूप मैं ।
इत्यादि चिन्तन जीव का, अहंकार कहते हैं इसे ॥१०.३॥