
ये नरा निरहंकारं वितन्वंति प्रतिक्षणं ।
अद्वैतं ते स्वचिद्रूपं प्राप्नुवंति न संशयः ॥4॥
जो जीव निरहंकारमय, परिणाम प्रतिक्षण बड़ाते ।
संशय नहीं अद्वैत चिद्रूप, प्राप्त करते नियम से ॥१०.४॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य प्रति समय निरहंकारता की वृद्धि करते रहते हैं, अहंकार नहीं करते; उन्हें निस्संदेह अद्वैतस्वरूप स्वचिद्रुप की प्राप्ति होती है ।