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स्वरूप-उपलब्धि का उत्कृष्ट कारण
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न देहोऽहं न कर्माणि न मनुष्यो द्विजोऽद्विजः ।
नैव स्थूलो कृशो नाहं किंतु चिद्रूपलक्षणः ॥5॥
मैं तन नहीं नहिं कर्म नर, द्विज अद्विज थूल कृशी नहीं ।
चिद्रूप लक्षणमय सदा मैं शुद्ध आतम एक ही ॥१०.५॥