चिंतनं निरहंकारो भेदविज्ञानिनामिति ।
स एव शुद्धचिद्रूपलब्धये कारणं परं ॥6॥
नित भेद-विज्ञानी का चिन्तन, यही निरहंकार है ।
बस यही शुद्ध चिद्रूप लब्धि का परम सत् हेतु है ॥१०.६॥