
निर्ममत्वे तपोऽपि स्वादुत्तमं पंचमं व्रतं ।
धर्मोऽपि परमस्तस्मान्निर्ममत्वं विचिंतयेत् ॥16॥
है श्रेष्ठ निर्ममता में तप, परिग्रह रहित व्रत श्रेष्ठ ही ।
है धर्म सर्वोत्तम यही, यों भाओ निर्ममता सभी ॥१०.१६॥
अन्वयार्थ : पर-पदार्थों की ममता न रखने से - भले प्रकार निर्ममत्व के पालन करने से, उत्तम तप और पाँचवें निष्परिग्रह नामक व्रत का पूर्णरूप से पालन होता है, सर्वोत्तम धर्म की भी प्राप्ति होती है इसलिये यह निर्ममत्व ही ध्यान करने योग्य है ।