निर्ममत्वाय न क्लेशो नान्ययांचा न चाटनं ।
न चिंता न व्ययस्तस्मान्निर्ममत्वं विचिंतयेत् ॥17॥
निर्ममत्व-हेतु क्लेश नहिं, नहिं याचना चाटन नहीं ।
नहिं सोच नहिं धन व्यय कभी, यों भाओ निर्ममता सभी ॥१०.१७॥
अन्वयार्थ : इस निर्ममत्व के लिये न किसी प्रकार का क्लेश भोगना पड़ता है, न किसी से कुछ मांगना और न चाटुकार (चापलसी) करना पड़ता है । किसी प्रकार की चिंता और द्रव्य का व्यय भी नहीं करता पडता, इसलिये निर्ममत्व ही ध्यान करने योग्य है ।