नास्रवो निर्ममत्वेन न बंधोऽशुभकर्मणां ।
नासंयमो भवेत्तस्मान्निर्मभत्वं विचिंतयेत् ॥18॥
निर्ममत्व से आस्रव नहीं, अशुभों का बन्धन भी नहीं ।
नहिं हों असंयम आदि कुछ, यों भाओ निर्ममता सभी ॥१०.१८॥
अन्वयार्थ : इस निर्ममत्व से अशुभ कर्म का आस्रव और बंध नहीं होता, संयम में भी किसी प्रकार की हानि नहीं आती - वह भी पूर्णरूपसे पलता है, इसलिये यह निर्ममत्व ही चिंतवन करने योग्य पदार्थ है ।