
सद्दृष्टिर्ज्ञानवान् प्राणी निर्ममत्वेन संयमी ।
तपस्वी च भवेत् तस्मान्निर्ममत्वं विचिंतयेत् ॥19॥
सद्दृष्टि सद् ज्ञानी सभी, हों निर्ममत्व से संयमी ।
होते तपस्वी भी यही, यों भाओ निर्ममता सभी ॥१०.१९॥
अन्वयार्थ : इस निर्ममत्व की कृपा से जीव सम्यगदृष्टि, ज्ञानवान, संयमी और तपस्वी होता है, इसलिये जीवों को निर्ममत्व का ही चिंतवन कार्यकारी है ।