+ उपलब्धि बताकर इसी निर्ममत्व की प्रेरणा -
रागद्वेषादयो दोषा नश्यंति निर्ममत्वतः ।
शाम्यार्थी सततं तस्मान्निर्ममत्वं विचिंतयेत् ॥20॥
निर्ममत्व से ही राग द्वेषादि विकार मिटें सभी ।
ध्या सतत साम्यार्थी यदि, यों भाओ निर्ममता सभी ॥१०.२०॥
अन्वयार्थ : इस निर्ममत्व के भले प्रकार पालन करने से राग द्वेष आदि समस्त दोष नष्ट हो जाते हैं, इसलिये जो मनुष्य समता (शांति) के अभिलाषी हैं - अपनी आत्मा को संसार के दुःखों से मुक्त करना चाहते हैं उन्हें चाहिये कि वे अपने मन को सब ओर से हटाकर शुद्धचिद्रूप की ओर लगावें ।