+ स्वरूप-प्राप्ति की पात्रता -
विचार्यत्थमहंकारममकारौ विमुंचति ।
यो मुनिः शुद्धचिद्रूपध्यानं स लभते त्वरा ॥21॥
यों सोच जो अहंकार सब, ममकार छोड़ें वे मुनि ।
नित शुद्ध चिद्रूप आत्मा का, ध्यान पाते शीघ्र ही ॥१०.२१॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार जो मुनि अहंकार और ममकार को अपने वास्तविक स्वरूप-शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति के नाश करने वाले समझ उनका सर्वथा त्याग कर देता है, अपने मन को रंचमात्र भी उनकी ओर जाने नहीं देता, उसे शीघ्र ही संसार में शुद्धचिद्रूप के ध्यान की प्राप्ति हो जाती है ।