
शांताः पांडित्ययुक्ता यमनियमबलत्यागरैवृत्तवंतः ।
सद्गोशीलास्तपोर्चानुतिनतिकरणा मौनिनः संत्यसंख्याः ।
श्रोतारश्चाकृतज्ञा व्यसनखजयिनोऽत्रोपसर्गेऽपिधीराः
निःसंगाः शिल्पिनः कश्चन तु विरलः शुद्धचिद्रूपरक्तः ॥1॥
बहु शान्त यम विद्वान त्यागी, नियमयुत वृत्ति बली ।
तप-शीलयुत पूजा नमन, स्तुति वक्ता श्रेष्ठ भी ॥
मौनी कृतज्ञी व्यसन बिन, इन्द्रिय-जयी उपसर्ग में ।
नित धीर परिग्रह-रहित शिल्पी, श्रेष्ठ श्रोता शास्त्र के ॥
इत्यादि बहु-विध गुणों, उच्च विशेषताओं से सहित ।
बहु नर परन्तु अति विरल, चिद्रूप निज में ही निरत ॥१॥
अन्वयार्थ : [अत्र] इस-लोक में [शान्ता] शान्त मनवाले [पाण्डित्य-युक्ता] विद्वत्ता से सहित [यम-नियम-बल-त्याग-रै-वृत्त-वन्त] यमवान, नियमवान, बलवान, त्यागवान, धनवान, चारित्रवान [सत्-गो] यथार्थ वक्ता [शीला] शीलवान [तप:-अर्चा-नुति-नति-करणा] तप, पूजा, स्तुति और नमस्कार करनेवाले [मौनिन] मौनी च] और [श्रोतार] सुननेवाले [कृतज्ञा] किए हुए उपकार को जाननेवाले [व्यसन-खजयिन] व्यसन और इन्द्रियों को जीतनेवाले [उपसर्गे] उपसर्ग में [अपि] भी [धीरा] निश्चल रहनेवाले [निस्संगा] अपरिग्रही [शिल्पिन] कलाओं के जानकार [असंख्या] अनेकों [संति] हैं [तु] परंतु [शुद्ध-चिद्रूप-रक्त] शुद्ध-चिद्रूप में आसक्त [कश्चन] कोई [विरल] बिरला है ॥१॥