ये चैत्यालयचैत्यदानमहसद्यात्रा कृतौ कौशला
नानाशास्त्रविदः परीषहसहा रक्ताः परोपकृतौ ।
निःसंगाश्च तपस्विनोपि बहवस्ते संति ते दुर्लभा
रागद्वेषविमोहवर्जनपराश्चित्तत्त्वलीनाश्च ये ॥2॥
बहु करें जिनमन्दिर मूर्ति, दान उत्सव यात्रा ।
करने में कौशल परीषह-जय, शास्त्रज्ञ पर-कारिता ॥
निस्संग तपसी आदि हैं बहु नर परन्तु अति विरल ।
सब मोह राग द्वेष मेटन शील चिन्मय लीन नित ॥२॥
अन्वयार्थ : [ये] जो [चैत्यालय-चैत्य-दान-महसत्-यात्रा कृतौ] जिन-मन्दिर के निर्माण में, प्रतिमा-दान में, महा उत्सव करने, तीर्थों की यात्रा करने में [कौशला] प्रवीण (हैं) [नाना-शास्त्र-विद] विविध शास्त्रों के जानकार [परीषह-सहा] परिषह सहनेवाले [पर उपकृतौ] पर का उपकार करने में [रक्ता] आसक्त [निस्संगा] अपरिग्रही [च] और तपस्विन] तपस्वी [अपि] भी [सन्ति] हैं [ते] वे [बहव] अनेकों हैं (परन्तु) [ये] जो [राग-द्वेष-विमोह-वर्जन-परा] राग, द्वेष, मोह के पूर्णतया त्याग में लगे हुए [च] और [चित्-तत्त्व-लीना] चेतन-तत्त्व में स्थिर हैं [ते] वे [दुर्लभा] बिरले (हैं) ॥२॥