सुरूपबललावण्यधनापत्यगुणान्विताः ।
गांभीर्यधैर्यधौरेयाः संत्यसंख्या न चिद्रताः ॥4॥
अति रूप बल लावण्य धन, गम्भीर सुत धीर-वीरता ।
इत्यादि गुण युत अनेकों, पर विरल चिन्मय-लीनता ॥४॥
अन्वयार्थ : [सुरूप-बल-लावण्य-धन-अपत्य-गुण+अन्विता] सुन्दर रूप, उत्कृष्ट बल, लावण्य/सौन्दर्य, धन, सन्तान, गुणों से सम्पन्न [गांभीर्य-धैर्य-धौरेया] गंभीरता, धीरता, वीरता-सम्पन्न [असंख्या] अनेकों [संति] हैं [(परन्तु) चित्-रता] चैतन्य में लीन [न] नहीं हैं ॥४॥