
जलद्यूतवनस्त्रीवियुद्धगोलकगीतिषु ।
क्रीडंतोऽत्र विलोक्यंते घनाः कोऽपि चिदात्मनि ॥5॥
जल जुआ वन स्त्री विहग, युद्ध गोलिमार गीतादि में ।
क्रीड़ा करें बहु नर परन्तु, विरल स्थिर स्वयं में ॥५॥
अन्वयार्थ : [अत्र] इस-लोक में [जल-द्यूत-वन-स्त्री-वि-युद्ध-गोलक-गीतिषु] जल में, जुआ में, वन में, स्त्रिओं में, पक्षिओं के युद्ध में, गोली-मार, गीत में [क्रीडन्त] क्रीड़ा करनेवाले [घना] अनेकों [विलोक्यन्ते] देखे जा सकते हैं [ चित्+आत्मनि] चैतन्य-स्वरूप में [क:+अपि] कोई विरल ही है ॥५॥