सिंहसर्पगजव्याघ्राहितादीनां वशीकृतौ ।
रताः संत्यत्र बहवो न ध्याने स्वचिदात्मनः ॥6॥
सिंह सर्प हाथी व्याघ्र आदि, अहितकर को वश करण ।
तल्लीन रहते अनेकों, चिद्रूप ध्याता हैं विरल ॥६॥
अन्वयार्थ : [अत्र] यहाँ [सिंह-सर्प-गज-व्याघ्र+अहित+आदीनां] शेर, साँप, हाथी, व्याघ्र, अहित-कर/शत्रु आदि को [वशीकृतौ] वश में करने-हेतु [रता] संलग्न बहव] अनेकों [सन्ति] हैं [(परन्तु) स्व-चित्+आत्मन] अपने चिद्रूप के [ध्याने] ध्यान में (लीन) [न] नहीं हैं ॥६॥