+ चिद्रूप में लीन व्यक्ति विरलों में भी विरल -
जलाग्निरोगराजाहिचौरशत्रुनभस्वतां ।
दृश्यंते स्तंभने शक्ताः नान्यस्य स्वात्मचिंतया ॥7॥
जल आग राजा रोग अहि, रिपु चोर वायु शक्ति को ।
रोधन समर्थ अनेक विरले अन्य तज ध्या स्वयं को ॥७॥
अन्वयार्थ : [जल+अग्नि-रोग-राजा+अहि-चौर-शत्रु-नभस्वतां] जल, आग, रोग, राजा, सर्प, चोर, शत्रु, वायु के [स्तम्भने] स्तम्भन में [शक्ता] समर्थ [दृश्यन्ते] दिखाई देते हैं [(परन्तु) स्व+आत्म-चिंतया] अपने स्वरूप के चिंतन द्वारा [अन्यस्य] पर का (लक्ष्य छोड़नेवाले) [न] नहीं हैं ॥७॥