
एकेन्द्रियादसंज्ञाख्यापूर्णंपर्यंतदेहिनः ।
अनंतानंतमाः संति तेषु न कोऽपि तादृशः ॥10॥
पंचाक्षिसंज्ञिपूर्णेषु केचिदासन्नभव्यतां ।
नृत्वं चालभ्य तादृक्षा भवंत्यार्याः सुबुद्धयः ॥11॥
एकेन्द्रियों से असंज्ञी तक, अनन्तानन्त पर्याप्तक ।
हैं नहीं उनमें योग्यता, निज शुद्ध आतम की समझ ॥१०॥
जो पाँच इन्द्रिय पूर्ण मन नर, निकट भव्यत्व पा हुए ।
हैं आर्य सद्बुद्धी सहित, वे ही निजातम समझते ॥११॥
अन्वयार्थ : [एकेन्द्रियात्] एकेन्द्रिय से [असंज्ञ+आख्या-पूर्ण-पर्यंतदेहिन] असंज्ञी नामक पंचेन्द्रिय पर्यन्त शरीर-धारी [अनन्त+अनन्तमा] अनन्तानन्त संति] हैं [तेषु] उनमें [तादृश] उस प्रकार का [क:+अपि] कुछ भी [न] नहीं है / उनमें आत्माराधना की सामर्थ्य नहीं है [पंच+अक्ष-संज्ञि-पूर्णेषु] पंचेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्तकों में [केचित्] कोई [आर्या] आर्य [सुबुद्ध्य] सुबुद्धि-सम्पन्न [आसन्न-भव्यतां] निकट भव्यता को [च] और [नृत्वं] मनुष्यता को [आलभ्य] प्राप्त कर [तादृक्षा] उस प्रकार की योग्यतावाले [भवन्ति] होते हैं ॥११-१२॥