
शुद्धचिद्रूपसंलीनाः सव्रता न कदाचन ।
नरलोकबहिर्भागेऽसंख्यातद्वीपवार्धिषु ॥12॥
नर लोक बाहर असंख्यातों, द्वीप सागर में रहें ।
सब भोगभूमिज शुद्ध चिद्रूप, लीन व्रत युत नहीं हैं ॥१२॥
अन्वयार्थ : [नर-लोक-बहि:भागे] मनुष्य-लोक से बाहर के भाग में [असंख्यातद्वीप-वार्धिषु] असंख्यात द्वीप-समुद्रों में [कदाचन] कभी भी [सव्रता] व्रत-सहित [शुद्ध-चिद्रूप-संलीना] शुद्ध-चिद्रूप में भली-भाँति लीन [न] नहीं होते हैं ॥१२॥