+ अन्य क्षेत्रों में भी इसकी दुर्लभता -
अधोलोके न सर्वस्मिन्नूर्ध्वलोकेऽपि सर्वतः ।
ते भवंति न ज्योतिष्के हा हा क्षेत्रस्वभावतः ॥13॥
है क्षेत्रगत स्व-भाव ऊर्ध्व अधो रु ज्योतिर्लोक में ।
निज शुद्ध चिद्रूप ध्यान, व्रतमय आचरण नहिं हो सके ॥१३॥
अन्वयार्थ : [हा-हा] आश्चर्य है कि [क्षेत्र-स्वभावत] क्षेत्र के स्वभाव से [सर्वस्मिन् अधोलोके] सम्पूर्ण अधो-लोक में [सर्वत] सभी ओर से [ऊर्ध्वलोके+अपि] ऊर्ध्व-लोक में भी [ज्योतिष्के] ज्योतिर्लोक में [ते] वे / व्रत-सहित स्वरूप-साधक [न] नहीं होते हैं ॥१३॥