+ योग्यता के अभाववाले मनुष्य-लोक का प्ररूपण -
नरलोकेपि ये जाता नराः कर्मवशाद् घनाः ।
भोगभूम्लेच्छखंडेषु ते भवंति न तादृशः ॥14॥
नर लोक में भी तीव्र कर्मोंदयों से भोग भू म्लेच्छ ।
भू-खण्ड में जन्में समर्थ नहीं व्रतादि में समझ ॥१४॥
अन्वयार्थ : [नर-लोके+अपि] मनुष्य-लोक में भी [ये] जो [घना] अनेकों [नरा] मनुष्य [कर्म-वशात्] कर्म के उदय-वश [भोग-भू-म्लेच्छ-खण्डेषु] भोगभूमि और म्लेच्छ-खण्डों में [जाता] उत्पन्न होते हैं [ते] वे [तादृश] उस प्रकार की योग्यतावाले [न] नहीं [भवन्ति] होते हैं ॥१४॥