
आर्यखंडभवाः केचिद् विरलाः संति तादृशाः ।
अस्मिन् क्षेत्रे भवा द्वित्राः स्युरद्य न कदापि वा ॥15॥
जो आर्य खण्डों में हुए, उनमें विरल इस योग्य हैं ।
पर अभी तो इस क्षेत्र में, दो तीन या फिर नहीं हैं ॥१५॥
अन्वयार्थ : [आर्य-खण्ड-भवा] आर्य-खण्ड में उत्पन्न हुए [केचित्] कोई [विरला] विरल [तादृशा] उस प्रकार की योग्यता-सम्पन्न [संति] हैं [अस्मिन्] इस [क्षेत्रे] क्षेत्र में [भवा] जन्म लेनेवाले [द्वित्रा] दो, तीन [वा] अथवा [अद्य] आज [कदापि] कभी/कोई भी [न] नहीं [स्यु] हैं ॥१५॥