+ धार्मिक क्षेत्र में उत्तरोत्तर विरलता -
अस्मिन् क्षेत्रेऽधुना संति विरला जैनपाक्षिकाः ।
सम्यक्त्वसहितास्तत्र तत्राणुव्रतधारिणः ॥16॥
महा-व्रत-धरा धीरा: संति चात्यंत-दुर्लभा: ।
तत्त्वातत्त्व-विदस्तेषु चिद्रक्तोऽत्यंत-दुर्लभ: ॥17॥
हैं जैन पाक्षिक भी अभी तो, विरल ही इस क्षेत्र में ।
उनमें सदा सम्यक्त्व-युत, अणुव्रती नित विरले रहें ॥१६॥
उनमें अति दुर्लभ सुधीर, महान व्रतधारी सदा ।
उनमें भी तत्त्व-अतत्त्व-विद्, चिद्रूप-रत दुर्लभ महा ॥१७॥
अन्वयार्थ : [अस्मिन्] इस [क्षेत्रे] क्षेत्र में [अधुना] इस समय [जैन-पाक्षिका] पाक्षिक जैन [विरला] विरल [संति] हैं [तत्र] उनमें भी [सम्यक्त्व-सहिता] सम्यक्त्व से सहित [तत्र] उनमें भी [अणु-व्रत-धारिण] अणु-व्रत-धारक/देश-संयमी [धीरा] धीरता-सम्पन्न [महा-व्रत-धरा] महा-व्रत धारण करनेवाले [अत्यन्त-दुर्लभा] अत्यन्त विरल [संति] हैं [तेषु] उनमें भी [तत्त्व-अतत्त्व-विद] तत्त्व और अतत्त्व के जानकार [च] और [चित्-रक्त] चिद्रूप में आसक्त [अत्यन्त-दुर्लभ] अत्यधिक विरल हैं ॥१६-१७॥