
तपस्विपात्रविद्वत्सु गुणिसद्गतिगामिषु ।
वंद्यस्तुत्येषु विज्ञेयः स एवोत्कृष्टतां गतः ॥18॥
चिद्रूप-रत ही तपस्वी, विद्वान गुणयुत वन्द्य में ।
स्तुत्य पात्र सुपथ-चरी में श्रेष्ठतम आत्मस्थ हैं ॥१८॥
अन्वयार्थ : [तपस्वि-पात्र-विद्वत्सु] तपस्विओं, पात्रों, विद्वानों में [गुणीसत्-गति-गामिषु] गुणिओं में, सन्मार्ग पर चलनेवालों में [वंद्य:-स्तुत्येषु] वन्दनीय, स्तुति करने-योग्य व्यक्तिओं में [स: एव] वही / स्वरूप-साधक ही [उत्कृष्टतां] श्रेष्ठता को [गत] प्राप्त है [ विज्ञेय] जानना चाहिए ॥१८॥