+ उसी विरलता की पुष्टि -
उत्सर्पिण्यवसर्पंणकालेऽनाद्यंतवर्जिते स्तोकाः ।
चिद्रक्ता व्रतयुक्ता भवंति केचित्कदाचिच्च ॥19॥
इस अनाद्यनन्त समयमयी उत्सर्पिणी अवसर्पिणी ।
में शुद्ध चिद्रूप-लीन, व्रत संयुक्त होते कहिं कभी ॥१९॥
अन्वयार्थ : [अन्+आदि+अन्त-वर्जिते] आदि-अंत से रहित / अनादि-अनन्त [उत्सर्पिणी+अवसर्पण-काले] उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी काल में [चित्-रक्ता] चैतन्य में लीन [व्रत-युक्ता] व्रत-सम्पन्न [केचित्] कोई [च] और [कदाचित्] कभी [स्तोका] अल्प [भवन्ति] होते हैं ॥१९॥