+ विरलता गुणस्थान की अपेक्षा -
मिथ्यात्वादिगुणस्थानचतुष्के संभवंति न ।
शुद्धचिद्रूपके रक्ता व्रतिनोपि कदाचन ॥20॥
पंचमादिगुणस्थानदशके तादृशोंऽगिनः ।
स्युरिति ज्ञानिना ज्ञेयं स्तोकजीवसमाश्रिते ॥21॥
मिथ्यात्व आदि चार गुण-स्थान में संभव कभी ।
भी हैं नहीं चिद्रूपरत, व्रत सहित चौथे समकिती ॥२०॥
हैं पंचमादि दश गुणस्थानों में चिद् रत व्रत सहित ।
अत्यल्प जीव सुयोग्य, आतम निष्ठ ज्ञानी ज्ञेय नित ॥२१॥
अन्वयार्थ : [शुद्ध-चिद्रूपके] शुद्ध-चिद्रूप में [रक्ता] आसक्त [(और) व्रतिन:+अपि] व्रती भी [मिथ्यात्व+आदि-गुण-स्थान-चतुष्के] मिथ्यात्व आदि चार गुण-स्थानों में [कदाचन] कभी भी [न] नहीं [संभवन्ति] होते हैं [स्तोक-जीव-समाश्रिते] अल्प जीवों की विद्यमानतावाले [पंचम+आदि-गुणस्थान-दशके] पाँचवें आदि दश गुणस्थाना में [तादृशा] उस प्रकार की योग्यतावाले [अंगिन] जीव [स्यु] होते हैं [इति] ऐसा ज्ञानिना] ज्ञानी द्वारा [ज्ञेयं] जानने-योग्य है ॥२०-२१॥