
दृश्यंते गंधनादावनुजसुतसुताभीरुपित्रंविकासु
ग्रामे गेहे खभोगे नगनगरखगे वाहने राजकार्ये ।
आहार्येऽगे वनादौ व्यसनकृषिमुखेकूपवापीतडागे
रक्ताश्चप्रेषणादौ यशसि पशुगणे शुद्धचिद्रूपके न ॥22॥
बहु जीव लीन सुगन्ध में, सुत सुता माता पिता में ।
स्त्री अनुज घर नगर वाहन, राज खग नग भोग में ॥
पंचेन्द्रियों के भोग तन वन, व्यसन खेती बावड़ी ।
सर कूप यश प्रेषण पशु, संरक्षणादि लीन ही ॥
इत्यादि बहुविध भाव वस्तु, प्रीति में जग लीन है ।
पर शुद्ध चिद्रूप ध्यान में, निज आत्म में नहिं लीन हैं ॥२२॥
अन्वयार्थ : [गंधन+आदौ] सुगंधित पदार्थ में [अनुज-सुत-सुता-भीरु-पितृ-अंबिकासु] छोटे भाई, पुत्र, पुत्री, पत्नी, पिता, माता में [ग्रामे] ग्राम में [गेहे] घर में [ख-भोगे] इन्द्रियों के भोग में [नग-नगर-खगे] पर्वत, नगर, पक्षी में [वाहने] वाहन में [राज-कार्ये] राज-कार्य में [आहार्ये] भोजन में [अंगे] देह में [वन+आदौ] वन आदि में [व्यसन-कृषि-मुखे] व्यसन, खेती, मुख में [कूप-वापी-तडागे] कुँआ, बावड़ी, तालाब में [प्रेषण-आदौ] इधर-उधर भेजने आदि में [यशसि] यश में [पशु-गणे] पशु-समूह में रक्ता] अनुराग करते हैं [ शुद्ध-चिद्रूपके] शुद्ध-चिद्रूप में [न] नहीं ॥२२॥