
रत्नत्रयोपलंभेन विना शुद्धचिदात्मनः ।
प्रादुर्भावो न कस्यापि श्रूयते हि जिनागमे ॥1॥
सत् रत्नत्रय की प्राप्ति बिन, चिन्मय निजातम शुद्धता ।
की प्रगटता होती नहीं, यों जिनागम में है कहा ॥१॥
अन्वयार्थ : जैन-शास्त्र से यह बात जानी गई है कि बिना रत्नत्रय को प्राप्त किए, आज तक किसी भी जीव को शुद्ध-चिद्रूप की प्राप्ति नहीं हुई । सबको रत्नत्रय के लाभ के बाद ही हुई है ।