
विना रत्नत्रयं शुद्धचिद्रूपं न प्रपन्नवान् ।
कदापि कोऽपि केनापि प्रकारेण नरः क्वचित् ॥2॥
नित नहीं पाया सत् रतनत्रय, विना शुद्ध चिद्रूप को ।
नहिं किसी ने न कभी भी, नहिं साधता जो स्वयं को ॥२॥
अन्वयार्थ : बिना रत्नत्रय को प्राप्त किए आज तक किसी मनुष्य ने कहीं और कभी भी किसी दूसरे उपाय से शुद्ध-चिद्रूप को प्राप्त नहीं किया । सभी ने पहले रत्नत्रय को पाकर ही शुद्ध-चिद्रूप की प्राप्ति की है ॥२॥