
रत्नत्रयाद्विना चिद्रूपोपलब्धिर्न जायते ।
यथर्द्धिस्तपसः पुत्री पितुर्वृष्टिर्बलाहकात् ॥3॥
ज्यों तप विना ऋद्धि, पिता बिन सुता, वर्षा मेघ बिन ।
त्यों शुद्ध चिद्रूप की प्रगटता, हो नहीं त्रय रत्न बिन ॥३॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार तप के ऋद्धि, पिता के बिना पुत्री और मेघ के बिना वर्षा नहीं हो सकती; उसी प्रकार बिना रत्नत्रय की प्राप्ति के शुद्ध-चिद्रूप की भी प्राप्ति नहीं हो सकती ।