
दर्शनज्ञानचारित्रस्वरूपात्मप्रवर्तनं ।
युगपद् भण्यते रत्नत्रयं सर्वजिनेश्वरैः ॥4॥
सद् दर्श ज्ञान चारित्रमय, इकसाथ आतम प्रवर्तन ।
सम्यक् रत्नत्रय है यही, कहते सभी जिनवर वृषभ ॥४॥
अन्वयार्थ : भगवान जिनेश्वर ने एक साथ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रस्वरूप आत्मा की प्रवृत्ति को रत्नत्रय कहा है ।