
निश्चयव्यवहाराभ्यां द्विधा तत्परिकीर्तितं ।
सत्यस्मिन् व्यवहारे तन्निश्चयं प्रकटीभवेत् ॥5॥
यह कहा है दो भेदमय, निश्चय तथा व्यवहार से ।
व्यवहार होने पर सदा, निश्चय प्रगट होता इसे ॥५॥
अन्वयार्थ : यह रत्नत्रय निश्चय और व्यवहार के भेद से दो प्रकार का कहा गया है और व्यवहार रत्नत्रय हो वहाँ निश्चय रत्नत्रय की प्रगटता होती है ।