
श्रद्धानं दर्शनं सप्ततत्त्वानां व्यवहारतः ।
अष्टांगं त्रिविधं प्रोक्तं तदौपशमिकादितः ॥6॥
व्यवहार से तत्त्वार्थ सातों, की सुश्रद्धा सद् दरश ।
अष्टांगयुत औपशमिक आदि, तीन भेदमई कथन ॥६॥
अन्वयार्थ : व्यवहार-नय से सातों तत्वों का श्रद्धान करना, सम्यग्दर्शन है । इसके आठ अंग हैं तथा औपशमिक, क्षायिक एवं क्षायोपशमिक के भेद से यह तीन प्रकार का है ।