+ सम्यग्दर्शन का स्वरूप -
सता वस्तूनि सर्वाणि स्याच्छब्देन वचांसि च ।
चिता जगति व्याप्तानि पश्यन् सद्दृष्टिरुच्यते ॥7॥
सत् रूप से सब वस्तुएं, स्यात् शब्द पूर्वक वचन सब ।
चित् से जगत में व्याप्त, सबको मानता सद्दृष्टि वह ॥७॥
अन्वयार्थ : जो महानुभाव सत्रूप से समस्त पदार्थों का विश्वास करता है, अनेकान्तरूप से समस्त वचनों को और ज्ञान से समस्त जगत में व्याप्त (सर्व पदार्थों को) देखता है, श्रद्धता है, वह सम्यग्दृष्टि है ।