+ निश्चय सम्यग्दर्शन का स्वरूप -
स्वकीये शुद्धचिद्रूपे रुचिर्या निश्चयेन तत् ।
सद्दर्शनं मतं तज्ज्ञैः कर्मेंधनहुताशनं ॥8॥
स्वकीय शुद्ध चिद्रूप में, जो रुचि वह परमार्थ से ।
सद् दरश कर्मेन्धन हुताशन, बताया सब विज्ञ ने ॥८॥
अन्वयार्थ : आत्मिक शुद्ध-चिद्रूप में जो रुचि करना है, वह निश्चय सम्यग्दर्शन है और यह कर्मरूपी ईंधन के लिये जाज्वल्यमान अग्नि है - ऐसा उसके ज्ञाता ज्ञानियों का मत है ॥८॥