
ज्ञात्वाष्टांगानि तस्यापि भाषितानि जिनागमे ।
तैरमा धार्यते तद्धि मुक्तिसौख्याभिलाषिणा ॥10॥
शिव सौख्य अभिलाषी, जिनागम कथित आठों अंग को ।
नित जान उनसे सहित, सम्यग्दरश को धारण करो ॥१०॥
अन्वयार्थ : जो महानुभाव मोक्ष सुख के अभिलाषी हैं । मोक्ष की प्राप्ति से ही अपना कल्याण समझते हैं; वे जैन-शास्त्र में वर्णन किए गए सम्यग्दर्शन को उसके आठ अंगों के साथ धारण करते हैं ।