+ सम्यग्ज्ञान की परिभाषा -
अष्टधाचारसंयुक्तं ज्ञानमुक्तं जिनेशिना ।
व्यवहारनयात् सर्वतत्त्वोद्भासो भवेद् यतः ॥11॥
स्वस्वरूपपरिज्ञानं तज्ज्ञानं निश्चयाद् वरं ।
कर्मरेणूच्चये वातं हेतुं विद्धि शिवश्रियः ॥12॥
नित आठ आचारों सहित, सब तत्त्व ज्ञाता प्रकाशक ।
है ज्ञान यह व्यवहार-नय से, जिनेश्वर द्वारा कथित ॥११॥
परमार्थ से निज आतमा का, ज्ञान सम्यग्ज्ञान है ।
वह कर्मरज नाशक पवन, शिवश्री प्राप्ति-हेतु है ॥१२॥
अन्वयार्थ : भगवान जिनेन्द्र ने व्यवहार-नय से आठ प्रकार के आचारों से युक्त ज्ञान बतलाया है और उससे समस्त पदार्थों का भली प्रकार प्रतिभास होता है; परन्तु जिससे स्वस्वरूप का ज्ञान हो, (जो शुद्ध-चिद्रूप को जाने) वह निश्चय सम्यग्ज्ञान है । यह निश्चय सम्यग्ज्ञान, समस्त कर्मों का नाशक है और मोक्षरूपी लक्ष्मी की प्राप्ति में परम कारण है, इससे मोक्ष-सुख अवश्य प्राप्त होता है ॥११-१२॥